मन के अति सुदूर कोनों तक
फैले मूक-बधिर सागर में,
तैर रहे हैं पंख पसारे
स्वप्न-हँस,
नभ में समीर से ।
दूर तलक उड़ने को आतुर
उफन रही हैं नम आँखें भी,
लिपट गई है तन-शाखों से
आश-लता,
वन में भुजंग सी ।
शीतल शांत स्वच्छंद सतह पर
फैली सूरज की लाली में,
लटक रहे हैं थाम तंतु-रवि
मन-पंछी,
सावन मल्हार से ।
सजल किनारों की रेती के
आत्मसंयमित चिर भूतल में,
दौड़ लगाने को अभिलाषित
भाव-अश्व,
जल में सियार से ।
स्वर्ण-जडित पिंजरे का कैदी
जिगर विह्वल हो बोल उठा है,
चमक रहे हैं क्यूँ दिन में भी
चाँद-सितारे,
मोर पंख से ।
मन के अति.................
फैले मूक-बधिर सागर में,
तैर रहे हैं पंख पसारे
स्वप्न-हँस,
नभ में समीर से ।
दूर तलक उड़ने को आतुर
उफन रही हैं नम आँखें भी,
लिपट गई है तन-शाखों से
आश-लता,
वन में भुजंग सी ।
शीतल शांत स्वच्छंद सतह पर
फैली सूरज की लाली में,
लटक रहे हैं थाम तंतु-रवि
मन-पंछी,
सावन मल्हार से ।
सजल किनारों की रेती के
आत्मसंयमित चिर भूतल में,
दौड़ लगाने को अभिलाषित
भाव-अश्व,
जल में सियार से ।
स्वर्ण-जडित पिंजरे का कैदी
जिगर विह्वल हो बोल उठा है,
चमक रहे हैं क्यूँ दिन में भी
चाँद-सितारे,
मोर पंख से ।
मन के अति.................
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