Thursday, September 20, 2012

आम का सूखा बूढ़ा पेड़

आज भी वैसा ही खड़ा है,
पोखर के किनारे
कई सौ साल पुराना,
आम का बूढ़ा सूखा पेड़ ।

बह गई है जड़ों की मिटटी 
सड़क से गिरते 
बारिश के पानी में,
पत्ते भी झर  गए हैं सारे 
आँधी में,
सूखकर,
खूँटा बन चुकी हैं मवेशियों का 
बाहर झांकती सूखी जडें,
फिर भी अडिग खड़ा है 
सीना फुलाए गर्व से,
आम का बूढा सूखा पेड़।


पहले तो गाना सुनाते रहते थे 
टहनियों को घर बनाये 
हजारों पक्षीं,
वो भी किनारा कर गए हैं 
छोड़कर मायूस सूना पेड़ ,
सदा के लिए,

कुछ एक बचे भी हैं,
चले जायेंगे दो चार दिनों में।

न जाने कितने पत्थर झेले थे
हरियाली के दिनों में,
और अब ?
काटने लगीं हैं टहनियां भी,
एक एक करके जलाने के लिए।
सुबकने लगा इतने पर 
पोखर के किनारे खड़ा 
कई सौ साल पुराना 
आम का सूखा बूढा पेड़। 
            

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