नूर की फिज़ा में खोया चाँद भी
शरमाने लगा है
रात के धुंधले आँचल के पीछे,
चाँदनी ने रखा ही है पैर
रजनी की शाख पे,
कि छंटने लगा कालिख का साया
आसमाँ के आँगन से ।
छत की फूटी मुंडेर से होकर
झाँक रहा है,
सफेदी का शैलाव
ये उजाला भी ।
बैठा हूँ टकटकी लगाये,
की कब गिरेगा कोई मोती छूटकर
आसमाँ के हाथों से,
झोली में मेरी..................
शरमाने लगा है
रात के धुंधले आँचल के पीछे,
चाँदनी ने रखा ही है पैर
रजनी की शाख पे,
कि छंटने लगा कालिख का साया
आसमाँ के आँगन से ।
छत की फूटी मुंडेर से होकर
झाँक रहा है,
सफेदी का शैलाव
ये उजाला भी ।
बैठा हूँ टकटकी लगाये,
की कब गिरेगा कोई मोती छूटकर
आसमाँ के हाथों से,
झोली में मेरी..................
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