Saturday, September 1, 2012

यादों का तहखाना



सोच रहा था बैठा

कमरे में ,
अरसा गुजर गया पलटे 
एल्बम के नाजुक पन्ने 
शायद पन्ने नहीं 
था एक जखीरा पुरानी यादों का ।
अजीब सी थी बेचैनी मन में 
आतुरता के धागे,
निकलकर आँखों से, 
लटक रहे थे अलमारी में,
एल्बम के ऊपर ।

क्या करते बेचारे ?

मजबूर थे हाथ भी ,
कच्चे धागे, 
लगे खींचने एल्बम की ओर, 
और ये हाथ भी बैठे थे 
न जाने क्या सोचकर !
उठा लिया खुद-व-खुद 
यादों का तहखाना ।

चिढने लगा 

बच्चों सी खिलखिलाहट से 
कमरे का सन्नाटा, 
बेतहासा बेदिल सा पड़ा दिल 
लगा छूने आसमान के तारे, 
मानो जागीर सारी दुनियाँ की 
हो कैद इसकी झोली में ।

काम की पाबन्द ये उंगलियाँ भी 

कहाँ बैठने वाली थी, 
चुपचाप, नीरस,  
खोल दिया झट से 
एल्बम का पहला पन्ना ।

खामोशी.......... 

सन्नाटे की छोटी बहन 
घुस आई थी कमरे में, 
खड़े थे दोनों भाई-बहिन 
विजयी मुस्कान के साथ ।
उतर आया ये दिल भी 
आसमान से नीचे 
सीढ़ियों के सहारे, 
बैठ गया पकड़ के 
हाथों में अपना सिर, 
धडकनों की रफ्तार 
बढ़ने लगी अचानक ।

मेरे चेहरे की उलझन 

पढ़ रहा था शायद, 
झांकता हुआ एक प्यारा सा चेहरा 
एल्बम की खिड़की से ।

यही था वो चेहरा, 

दिल के दूरस्थ कोने में बैठा, 
धूमिल सी छवि लिए, 
सूजी हुई लाल आँखें, 
रो रहा था, 
न जाने कितने दिनों से ?
कहाँ रुकने वाले थे आंसू 
आँखों से मेरी, 
उसका ये हाल देखकर ।
समाहित, 
एल्बम के उन प्यारे से पन्नों में , 
लगा था बहने, 
यादों का तहखाना, 
भावनाओं के बहाव के साथ, 
छोड़कर मुझे 
लटका अधर में............... 

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