सोच रहा था बैठा
कमरे में ,
अरसा गुजर गया पलटे
एल्बम के नाजुक पन्ने
शायद पन्ने नहीं
था एक जखीरा पुरानी यादों का ।
अजीब सी थी बेचैनी मन में
आतुरता के धागे,
निकलकर आँखों से,
लटक रहे थे अलमारी में,
एल्बम के ऊपर ।
क्या करते बेचारे ?
मजबूर थे हाथ भी ,
कच्चे धागे,
लगे खींचने एल्बम की ओर,
और ये हाथ भी बैठे थे
न जाने क्या सोचकर !
उठा लिया खुद-व-खुद
यादों का तहखाना ।
चिढने लगा
बच्चों सी खिलखिलाहट से
कमरे का सन्नाटा,
बेतहासा बेदिल सा पड़ा दिल
लगा छूने आसमान के तारे,
मानो जागीर सारी दुनियाँ की
हो कैद इसकी झोली में ।
काम की पाबन्द ये उंगलियाँ भी
कहाँ बैठने वाली थी,
चुपचाप, नीरस,
खोल दिया झट से
एल्बम का पहला पन्ना ।
खामोशी..........
सन्नाटे की छोटी बहन
घुस आई थी कमरे में,
खड़े थे दोनों भाई-बहिन
विजयी मुस्कान के साथ ।
उतर आया ये दिल भी
आसमान से नीचे
सीढ़ियों के सहारे,
बैठ गया पकड़ के
हाथों में अपना सिर,
धडकनों की रफ्तार
बढ़ने लगी अचानक ।
मेरे चेहरे की उलझन
पढ़ रहा था शायद,
झांकता हुआ एक प्यारा सा चेहरा
एल्बम की खिड़की से ।
यही था वो चेहरा,
दिल के दूरस्थ कोने में बैठा,
धूमिल सी छवि लिए,
सूजी हुई लाल आँखें,
रो रहा था,
न जाने कितने दिनों से ?
कहाँ रुकने वाले थे आंसू
आँखों से मेरी,
उसका ये हाल देखकर ।
समाहित,
एल्बम के उन प्यारे से पन्नों में ,
लगा था बहने,
यादों का तहखाना,
भावनाओं के बहाव के साथ,
छोड़कर मुझे
लटका अधर में...............
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