Wednesday, October 10, 2012

बस याद साथ है !

मन का प्यारा-सा आँगन
जब यादों से भर जाता है,
आरे में रखा ज्वलित दीपक भी 
चुपके से बुझ जाता है,
अंधियारी घोर स्याह चादर 
इस आँगन को ढँक लेती है,
खामोशी ईद मनाती है और 
दिल गुमसुम हो जाता है।

तब विकल हताशा की लहरें 
गुमसुम दिल से टकराती हैं,
भूली बिसरी-सी यादों का 
मंजर ताज़ा  हो जाता है,
कुछ ताज़ा  यादों का मंजर 
बस सपना बन रह जाता है।

कुछ यादों की मृदुल घड़ियाँ 
दिल दर पर दस्तक देती हैं,
तब सबसे प्यारे लम्हे भी 
कांटे बन चुभने लगते हैं,
फिर दर्द थामने का जिम्मा 
ये पागल दिल ले लेता है,
उस बेहाल अवस्था में 
दुनियां सूनी-सी लगती है।

छल, कपट, स्वार्थमय  अपना जग 
बेगाना लगने लगता है,
बस यादें अपनी होती हैं 
बाकी सब सपना लगता है 
बाकी सब सपना लगता है।।
           

Thursday, September 20, 2012

आम का सूखा बूढ़ा पेड़

आज भी वैसा ही खड़ा है,
पोखर के किनारे
कई सौ साल पुराना,
आम का बूढ़ा सूखा पेड़ ।

बह गई है जड़ों की मिटटी 
सड़क से गिरते 
बारिश के पानी में,
पत्ते भी झर  गए हैं सारे 
आँधी में,
सूखकर,
खूँटा बन चुकी हैं मवेशियों का 
बाहर झांकती सूखी जडें,
फिर भी अडिग खड़ा है 
सीना फुलाए गर्व से,
आम का बूढा सूखा पेड़।


पहले तो गाना सुनाते रहते थे 
टहनियों को घर बनाये 
हजारों पक्षीं,
वो भी किनारा कर गए हैं 
छोड़कर मायूस सूना पेड़ ,
सदा के लिए,

कुछ एक बचे भी हैं,
चले जायेंगे दो चार दिनों में।

न जाने कितने पत्थर झेले थे
हरियाली के दिनों में,
और अब ?
काटने लगीं हैं टहनियां भी,
एक एक करके जलाने के लिए।
सुबकने लगा इतने पर 
पोखर के किनारे खड़ा 
कई सौ साल पुराना 
आम का सूखा बूढा पेड़। 
            

Tuesday, September 4, 2012

सपनों की उड़ान

मन के अति सुदूर कोनों तक
फैले मूक-बधिर सागर में,
तैर रहे हैं पंख पसारे
स्वप्न-हँस,
नभ में समीर से ।

दूर तलक उड़ने को आतुर
उफन रही हैं नम आँखें भी,
लिपट गई है तन-शाखों से
आश-लता,
वन में भुजंग सी ।


शीतल शांत स्वच्छंद सतह पर
फैली सूरज की लाली में,
लटक रहे हैं थाम तंतु-रवि
मन-पंछी,
सावन मल्हार से ।

सजल किनारों की रेती के
आत्मसंयमित चिर भूतल में,
दौड़ लगाने को अभिलाषित
भाव-अश्व,
जल में सियार से ।

स्वर्ण-जडित पिंजरे का कैदी
जिगर विह्वल हो बोल उठा है,
चमक रहे हैं क्यूँ दिन में भी
चाँद-सितारे,
मोर पंख से ।

मन के अति.................                    

Monday, September 3, 2012

नूर की फ़िज़ा में खोया चाँद

नूर की फिज़ा में खोया चाँद भी
शरमाने लगा है
रात के धुंधले आँचल के पीछे,

चाँदनी ने रखा ही है पैर
रजनी की शाख पे,
कि छंटने लगा कालिख का साया
आसमाँ के आँगन से ।

छत की फूटी मुंडेर से होकर
झाँक रहा है,
सफेदी का शैलाव
ये उजाला भी ।

बैठा हूँ टकटकी लगाये,
की कब गिरेगा कोई मोती छूटकर
आसमाँ के हाथों से,
झोली में मेरी..................     

Saturday, September 1, 2012

यादों का तहखाना



सोच रहा था बैठा

कमरे में ,
अरसा गुजर गया पलटे 
एल्बम के नाजुक पन्ने 
शायद पन्ने नहीं 
था एक जखीरा पुरानी यादों का ।
अजीब सी थी बेचैनी मन में 
आतुरता के धागे,
निकलकर आँखों से, 
लटक रहे थे अलमारी में,
एल्बम के ऊपर ।

क्या करते बेचारे ?

मजबूर थे हाथ भी ,
कच्चे धागे, 
लगे खींचने एल्बम की ओर, 
और ये हाथ भी बैठे थे 
न जाने क्या सोचकर !
उठा लिया खुद-व-खुद 
यादों का तहखाना ।

चिढने लगा 

बच्चों सी खिलखिलाहट से 
कमरे का सन्नाटा, 
बेतहासा बेदिल सा पड़ा दिल 
लगा छूने आसमान के तारे, 
मानो जागीर सारी दुनियाँ की 
हो कैद इसकी झोली में ।

काम की पाबन्द ये उंगलियाँ भी 

कहाँ बैठने वाली थी, 
चुपचाप, नीरस,  
खोल दिया झट से 
एल्बम का पहला पन्ना ।

खामोशी.......... 

सन्नाटे की छोटी बहन 
घुस आई थी कमरे में, 
खड़े थे दोनों भाई-बहिन 
विजयी मुस्कान के साथ ।
उतर आया ये दिल भी 
आसमान से नीचे 
सीढ़ियों के सहारे, 
बैठ गया पकड़ के 
हाथों में अपना सिर, 
धडकनों की रफ्तार 
बढ़ने लगी अचानक ।

मेरे चेहरे की उलझन 

पढ़ रहा था शायद, 
झांकता हुआ एक प्यारा सा चेहरा 
एल्बम की खिड़की से ।

यही था वो चेहरा, 

दिल के दूरस्थ कोने में बैठा, 
धूमिल सी छवि लिए, 
सूजी हुई लाल आँखें, 
रो रहा था, 
न जाने कितने दिनों से ?
कहाँ रुकने वाले थे आंसू 
आँखों से मेरी, 
उसका ये हाल देखकर ।
समाहित, 
एल्बम के उन प्यारे से पन्नों में , 
लगा था बहने, 
यादों का तहखाना, 
भावनाओं के बहाव के साथ, 
छोड़कर मुझे 
लटका अधर में...............