ख्वाबों का आशियाना
Tuesday, February 10, 2015
ग़म-ऐ-वफ़ा
ख़ुशी गुमराह थी, या तेरा ठिकाना
न मंजिल थी उसकी तेरा ठिकाना ,
ग़म-ऐ-वफ़ा को गले से लगा ले
न होगा ये आलम, ग़मों का ठिकाना।।
1 comment:
BKVIMAL
January 8, 2021 at 5:21 AM
अब मंजिल भी है और ख़ुशी भी
दोनों को है दूर तक ले जाना
बधाई हो मेरे दोस्त
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अब मंजिल भी है और ख़ुशी भी
ReplyDeleteदोनों को है दूर तक ले जाना
बधाई हो मेरे दोस्त